This is in response to the cultural people who associate themselves with bjp and do anti people activities. Denigration is not being modern and fashionable , Denigration is deconstruction of once own culture taught by our upanishad rishis. One can not stop people being modern and pub going when one is proposing capitalism. Capitalism demands this kind of culture, it ushers this kinds of culture. We need to educate people especially those who claim themselves cultural police. We need to worship Vidya shakti in order to renew our culture and refute that which deconstructs our culture.
हम देवोपासना अपनी वासनाओं के लिये करते हैं, दुर्गा उपासना ज्यादातर लोग अपनी इच्छाओं के लिये करते हैं। कलिकाल में देवी की उपासना विद्या के रूप मे करना चाहिये जिससे अशुभ बुद्धि का विनाश हो सके। आज जो यह संसार तमाम परेशानियों से जूझ रहा है उसका कारण यह हैं कि व्यक्ति ज्ञान तत्व की साधना नहीं करता।
हर तरफ भागमभाग सिर्फ उन चीजों के लिये हैं जो अनश्वर कही जातीं है, क्षणिक कही जाती है फिर भी हम आध्यात्म ठोते रहते हैं। देवोपासना देवता बनने के लिये की जानी चाहिये न कि धन इत्यादि प्राप्त करने के लिये। नवरात्रि देवी के विद्या स्वरूप की उपासना के लिये होती है इन दिनों में साधक देवी से ज्ञान की याचना करता है। साल भर तो वह अविद्या द्वारा वशीभूत ही रहता है, इन दिनों मे उसे विद्या की याचना करनी चाहिये।
आज यदि जनता में यह विद्या तत्व उचित परिमाण में होता तो उन्हें विवेक होता कि किस तरह का नेता देश व समाज के लिये ठीक है। विवेक की कमी में लोग गुण्डों व मवालियों के हाथों में राज्यशक्ति सौप देते हैं। अरविन्द घोष ने एक बार ठीक ही कहा था कि अज्ञानियों के हाथों में राज्यशक्ति व धन शक्ति देश के विनाश का कारण बनती है। हमे देवी के विद्या रूप की प्रधानतया उपासना करनी चाहिये । आध्यात्मिक लोगों नें उन्हें इसी रूप में प्रमुखता से देखा है।
विद्याः समस्तास्तव देवि रूपाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमबयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपारा परोक्ति।।
वे संसार की चिति शक्ति है सब कुछ उनके अधीन है। वे सब कुछ प्रदान करती है जो उनके इस विद्या स्वरूप की पूजा करता है। सारे महामंत्र उनका स्वरूप हैं। विष्णुपुराण जो एक सबसे प्राचीन पुराण माना जाता है के अनुसार-
यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभते।
आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी।।
जिन्होने उनके इस विद्या रूप की उपासना की है उनके लिये सब कुछ सम्भव है, वे ही जगत को धन्य करते है। ॠषि लोग उनके विद्या रूप को ही नमन करते हैं क्योंकि यही वास्तव में उनका वास्तविक स्वरूप है।


